Friday, October 23, 2020

औरतों की माहवारीः कब तक जारी रहेगी शर्म ? बी बी सी से ……

https://www.bbc.com/ … enstruation_taboo_vr

हम किसी और के संसार में रहने लगे है (विख्यात चिंतक एवं गांधी विचारक धर्मपाल की कलम से.)

भारतीय मानस में सृष्टि के विकास के क्रम और उसमें मानवीय प्रयत्न और मानवीय ज्ञान-विज्ञान के स्थान की जो छवि अंकित है, वह आधुनिकता से इस प्रकार विपरीत है तो इस विषय पर गहन चिंतन करना पड़ेगा। यहां के तंत्र हम बनाना चाहते हैं और जिस विकास प्रक्रिया को यहां आरंभ करना चाहते हैं, वह तो तभी यहां जड़ पकड़ पाएगी और उसमें जनसाधारण की भागीदारी तो तभी हो पायेगी जब वह तंत्र और विकास प्रक्रिया भारतीय मानस और काल दृष्टि के अनुकूल होगी। इसलिए इस बात पर भी विचार करना पडे़गा कि व्यवहार में भारतीय मानस पर छाए विचारों और काल की भारतीय समझ के क्या अर्थ निकलते है? किस प्रकार के व्यवहार और व्यवस्थाएं उस मानस व काल में सही जँचते हैं? सम्भवतरू ऐसा माना जाता है कि मानवीय जीवन और मानवीय ज्ञान की क्षुद्रता का जो भाव भारतीय सृष्टि-गाथा में स्पष्ट झलकता है, वह केवल अकर्मण्यता को ही जन्म दे सकता है पर यह तो बहुत सही बात है। किसी भी विश्व व काल दृष्टि का व्यवाहारिक पक्ष तो समय सापेक्ष होता है। अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग समय पर उस दृष्टि की अलग-अलग व्याख्याएं होती जाती हैं। इन व्याख्याओं से मूल चेतना नहीं बदलती पर व्यवहार और व्यवस्थाएं बदलती रहती हैं और एक ही सभ्यता कभी अकर्मण्यता की और कभी गहन कर्मठता की ओर अग्रसर दिखाई देती है।
भारतीय परंपरा में किसी समय विधा और ज्ञान का दो धाराओं में विभाजन हुआ है। जो विधा इस नश्वर सतत परिवर्तनशील, लीलामयी सृष्टि से परे के सनातन ब्रह्म की बात करती है। उस ब्रह्म से साक्षात्कार का मार्ग दिखाती है वह परा विधा है। इसके विपरीत जो विधाएं इस सृष्टि के भीतर रहते हुए दैनंदिन की समस्याओं के समाधान का मार्ग बतलाती हैं। साधारण जीवन-यापन को संभव बनाती हैं। वे अपरा विधाएं है। और ऐसा माना जाता है कि परा विधा, अपरा विधाओं से ऊँची है।
अपरा के प्रति हेयता का भाव शायद भारतीय चित्त का मौलिक भाव नहीं है। मूल बात शायद अपरा की हीनता की नहीं थी। कहा शायद यह गया था कि अपरा में रमते हुए यह भूल नहीं जाना चाहिए कि इस नश्वर सृष्टि से परे सनातन सत्य भी कुछ है। इस सृष्टि में दैनिक जीवन के विभिन्न कार्य करते हुए परा के बारे में चेतन रहना चाहिए। अपरा का सर्वदा परा के आलोक में नियमन करते रहना चाहिए। अपरा विधा की विभिन्न मूल संहिताओं में कुछ ऐसा ही भाव छाया मिलता है। पर समय पाकर परा से अपरा के नियमन की यह बात अपरा की हेयता में बदल गई है। यह बदलाव कैसे हुआ इस पर तो विचार करना पडे़गा। भारतीय मानस व काल के अनुरूप परा और अपरा में सही संबंध क्या बैठता है, इसकी भी कुछ व्याख्या हमें करनी ही पड़ेगी।
पर यह ऊँच-नीच वाली बात तो बहुत मौलिक नहीं दिखती। पुराणों में इस बारे में चर्चा है। एक जगह ऋषि भारद्वाज कहते है कि यह ऊँच-नीच वाली बात कहां से आ गई? मनुष्य तो सब एक ही लगते है, वे अलग-अलग कैसे हो गए? महात्मा गाँधी भी यही कहा करते थे कि वर्णो में किसी को ऊँचा और किसी को नीचा मानना तो सही नहीं दिखता। 1920 के आस-पास उन्होंने इस विषय पर बहुत लिखा और कहा। पर इस विषय में हमारे विचारों का असंतुलन जा नहीं पाया। पिछले हजार दो हजार वर्षों में भी इस प्रश्न पर बहस रही होगी। लेकिन स्वस्थ वास्तविक जीवन में तो ऐसा असंतुलन चल नहीं पाता। वास्तविक जीवन के स्तर पर परा व अपरा के बीच की दूरी और ब्राह्मण व शूद्र के बीच की असमानता की बात भी कभी बहुत चल नहीं पाई होगी।
मौलिक साहित्य के स्तर पर भी इतना असंतुलन शायद कभी न रहा हो। यह समस्या तो मुख्यतरू समय-समय पर होने वाली व्याख्याओं की ही दिखाई देती है।
पुरूष सूक्त में यह अवश्य कहा गया है कि ब्रह्म के पांवों से शूद्र उत्पन्न हुए, उसकी जंघाओं से वैश्य आए, भुजाओं से क्षत्रिय आए और सिर से ब्राह्मण आए। इस सूक्त में ब्रह्मह्म और सृष्टि में एकरूपता की बात तो है। थोड़े में बात कहने का जो वैदिक ढंग है उससे यहाँ बता दिया गया है कि यह सृष्टि ब्रह्म का ही व्यास है, उसी की लीला है। सृष्टि में अनिवार्य विभिन्न कार्यो की बात भी इसमें आ गई है। पर इस सूक्त में यह तो कहीं नहीं आया कि शूद्र नीचे है और ब्राह्मण ऊँचे है। सिर का काम पांवों के काम से ऊँचा होता है। यह तो बाद की व्याख्या लगती है। यह व्याख्या तो उलट भी सकती है। पांवों पर ही तो पुरूष धरती पर खडा़ होता है। पांव टिकते हैं तो ऊपर धड़ भी आता है हाथ भी आते हैं। पांव ही नहीं टिकेंगें तो और भी कुछ नहीं आएगा। पुरूष सूक्त में यह भी नहीं है कि ये चारों वर्ण एक ही समय पर बने। पुराणों की व्याख्या से तो ऐसा लगता है कि आरंभ में सब एक ही वर्ण थे। बाद में काल के अनुसार जैसे-जैसे विभिन्न प्रकार की क्षमताओं की आवष्यकता होती गई, वैसे-वैसे वर्ण-विभाजित होते गए।
कर्म और कर्मफल के इस मौलिक सिद्धांत का इस विचार से तो कोई संबंध नहीं है कि कुछ कर्म अपने आप में निकृष्ट होता है और कुछ प्रकार के काम उत्तम। वेदों का उच्चारण करना ऊँचा काम होता है और कपडा़ बुनना नीचा काम, यह बात तो परा-अपरा वाले असंतुलन से ही निकल आई है। और इस बात की अपने यहाँ इतनी यांत्रिक-सी व्याख्या होने लगी है कि बड़े-बड़े विद्वान भी दरिद्रता, भुखमरी आदि जैसी सामाजिक अव्यवस्थाओं को कर्मफल के नाम पर डाल देते हैं। श्री ब्रह्मा नंद सरस्वती जैसे जोशीमठ के ऊँचे शंकराचार्य तक कह दिया करते थे कि दरिद्रता तो कर्मो की बात है। करूणा, दया, न्याय आदि जैसे भावों को भूल जाना तो कर्मफल के सिद्धांत का उद्देश्य नहीं हो सकता। यह तो सही व्याख्या नहीं दिखती।
कर्मफल के सिद्धांत का अर्थ तो शायद कुछ और ही है। क्योंकि कर्म तो सब बराबर ही होते हैं। लेकिन जिस भाव से, जिस तन्मयता से कोई कर्म किया जाता है वही उसे ऊँचा और नीचा बनाता है। वेदों का उच्चारण यदि मन लगाकर ध्यान से किया जाता है तो वह ऊँचा कर्म है। उसी तरह मन लगाकर ध्यान से खाना पकाया जाता है तो वह भी ऊँचा कर्म है। और भारत में तो ब्राह्मण लोग खाना बनाया ही करते थे। अब भी बनाते हैं। उनके वेदोच्चारण करने के कर्म में और खाना बनाने में बहुत अंतर है। पर वेदोच्चारण ऐसा किया जाए जैसे बेगार काटनी हो, या खाना ऐसे बनाया जाये जैसे सिर पर पड़ा कोई भार किसी तरह हटाना हो, तो दोनो की कर्म गडबड़ हो जाएंगे।
परा-अपरा और वर्ण व्यवस्था पर भी अनेक व्याख्याऐं होंगी। उन व्याख्याओं को देख-परखकर आज के संदर्भ में भारतीय मानव व काल की एक नई व्याख्या कर लेना ही विद्वता का उददेश्य हो सकता है। परंपरा का इस प्रकार नवीनीकरण करते रहना मानस को समयानुरूप व्यवहार का मार्ग दिखाते रहना ही हमेशा से ऋषियों, मुनियों और विद्वानों का काम कर रहा है

आलेख - यह बीसवीं-इक्कीसवीं सदी है किसकी - लेखक धर्मपाल

पृथ्वी के कष्टों का निवारण करने के लिए अवतार-पुरूष जन्म लिया करते हैं, यह मान्यता भारतवर्ष में अत्यन्त प्राचीन समय से चली आ रही है। इसलिए 1915 में भारत के लोगों ने सहज ही यह मान लिया कि भगवान ने उनका दुरूख समझ लिया है और उस दु:ख को दूर करने के लिए व भारतीय जीवन में एक नया संतुलन लाने के लिए महात्मा गाँधी को भेजा गया है। गाँधीजी के प्रयासों से भारतीय सभ्यता की दास्तान का दु:ख बहुत कुछ कट ही गया, लेकिन भारतीय जीवन में कोई संतुलन नहीं आ पाया। गाँधीजी 1948 के बाद जीवित रहते तो भी इस नए संतुलन के लिए तो कुछ और ही प्रयत्न करने पड़ते।
जो काम महात्मा गाँधी पूरा नहीं कर पाए उसे पूरा करने के प्रयास हमें आगे-पीछे तो आरंभ करने ही पड़ेंगे। आधुनिक विश्व में भारतीय जीवन के लिए भारतीय मानव व काल के अनुरूप कोई नया संतुलन ढूँढें बिना तो इस देश का बोझ हल्का नहीं हो पाएगा और उस नए ठोस धरातल को ढूँढने का मार्ग वही है जो महात्मा गांधी का था। इस देश के साधारणजन के मानस में पैठकर, उसके चित्त व काल को समझकर ही, इस देश के बारे में कुछ सोचा जा सकता है।
पर शायद हमें यह आभास भी है कि भारतीय चित्त वैसा साफ-सपाट नहीं है जैसा मानकर हम चलना चाहते हैं। वास्तव में तो वह सब विषयों पर सब प्रकार के विचारों से अटा पडा है और वे विचार कोई नए नहीं हैं। वे सब पुराने ही है। शायद ऋग्वेद के समय से वे चले आ रहे है या शायद गौतम बुद्ध के समय से कुछ विचार उपजे होंगे या फिर महावीर के समय से। पर जो भी ये विचार है जहां से भी वे आए हैं वे भारतीय मानस में बहुत गहरे बैठे हुए हैं। और शायद हम यह बात जानते हैं। लेकिन हम इस वास्तविकता को समझना नहीं चाहते। इसे किसी तरह नकार कर भारतीय मानस व चित्त की सभी वृत्तियों से आंखे मूंदकर अपने लिए कोई एक नई दुनिया हम गढ़ लेना चाहते हैं।
इसलिए अपने मानस को समझने की सभी कोशिशें हमें बेकार लगती हैं। अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी के भारत के इतिहास का मेरा अध्ययन भी भारतीय मानस को समझने का एक प्रयास ही था। उस अध्ययन से अंग्रेजों के आने से पहले के भारतीय राज-समाज की भारत के लोगों के सहज तौर-तरीकों की एक समझ तो बनी। समाज की जो भौतिक व्यवस्थाएं होती है, विभिन्न तकनीकें होती है, रोजमर्रा का काम चलाने के जो तरीके होते हैं, उनका एक प्रारूप-सा तो बना पर समाज के अंतर्मन की उसके मानस की चित्त की कोई ठीक पकड़ उस काम से नहीं बन पाई। मानस को पकड़ने का, चित्त को समझने का मार्ग शायद अलग होता है।
हममें से कुछ लोग शायद मानते हों कि वे स्वयं भारतीय मानस, चित्त व काल की सीमाओं से सर्वथा मुक्त हो चुके हैं। अपनी भारतीयता को लाँघकर वे पश्चिमी आधुनिकता या शायद किसी प्रकार की आदर्श मानवता के साथ एकात्म हो गए है। ऐसे कोई लोग है तो उनके लिए बीसवीं सदी की दृष्टि से कलियुग को समझना और भारतीय कलियुग को पश्चिम की बीसवीं सदी के रूप में ढालने के उपायों पर विचार करना संभव होता होगा, पर ऐसा अक्सर हुआ नहीं करता। अपने स्वाभाविक देश-काल की सीमाओं-मर्यादाओं से निकालकर किसी और के युग में प्रवेश कर जाना असाधारण लोगों के बस की भी बात नहीं होती। जवाहरलाल नेहरू जैसों से भी नहीं हो पाया होगा। अपनी सहज भारतीयता से पूरी तरह मुक्त वे भी नहीं हो पाए होंगें। महात्मा गाँधी के कहने के अनुसार भारत के लोगों में जो एक तर्कातीत और विचित्र-सा भाव है, उस विचित्र तर्कातीत भाव का शिकार होने से जवाहरलाल नेहरू भी नहीं बच पाए होगें फिर बाकी लोगों की तो बात ही क्या। वे तो भारतीय मानस की मर्यादाओं से बहुत दूर जा ही नहीं पाते होंगे।
भारत के बड़े लोगों ने आधुनिकता का एक बाहरी आवरण सा जरूर ओढ़ रखा है। पश्चिम के कुछ संस्कार भी शायद उनमें आए है। पर चित्त के स्तर पर वे अपने को भारतीयता से अलग कर पाए हो, ऐसा तो नहीं लगता। हां, हो सकता है कि पश्चिमी सभ्यता के साथ अपने लंबे और घनिष्ठ संबंध के चलते कुछ दस-बीस-पचास हजार, या शायद लाखों लोग, भारतीयता से बिल्कुल दूर हट गए हों। पर यह देश तो दस-बीस-पचास हजार या लाख लोगों का नहीं है। यह तो 125 करोड़ अस्सी करोड़ लोगों की कथा है।
भारतीयता की मर्यादाओं से मुक्त हुए ये लाखों आदमी जाना चाहेंगें तो यहाँ से चले ही जाएँगे। देश अपनी अस्मिता के हिसाब से अपने मानस, चित्त व काल के अनुरूप चलने लगेगा तो हो सकता है इनमें से भी बहुतेरे फिर अपने सहज चित्त-मानस में लौट आएँ। जिनका भारतीयता से नाता पूरा टूट चुका है, वे तो बाहर कही भी जाकर बस सकते हैं। जापान वाले जगह देंगे तो वहाँ जाकर रहने लगेंगे। जर्मनी में जगह हुई जर्मनी में रह लेंगे। रूस में कोई सुंदर जगह मिली तो वहाँ चले जाएंगे। अमेरिका में तो वे अब भी जाते ही हैं। दो-चार लाख भारतीय अमेरिका जाकर बसे ही हैं और उनमें बड़े-बड़े इंजीनियर, डॉक्टर, दार्शनिक, साहित्यकार, विज्ञानविद् और अन्य प्रकार के विद्वान भी शामिल है। पर इन लोगों का जाना कोई बहुत मुसीबत की बात नहीं है। समस्या उन लोगों की नहीं जो भारतीय चित्त व काल से टूटकर अलग जा बसे है। समस्या तो उन करोड़ों लोगों की है जो अपने स्वाभाविक मानस व चित्त के साथ जुड़कर अपने सहज काल में रह रहे है। इन लोगों के बल पर देश को कुछ बनाना है तो हमें उस सहज चित्त, मानस व काल को समझना पडेगा।
भारतीय वर्तमान के धरातल से पश्चिम की बीसवीं सदी का क्या रूप दिखता है, उस बीसवीं सदी और अपने कलियुग में कैसा और क्या संपर्क हो सकता है, इस सब पर विचार करना पडेगा। यह तभी हो सकता है जब हम अपने चित्त व काल को, अपनी कल्पनाओं व प्राथमिकताओं को और अपने सोचने-समझने व जीने के तौर-तरीकों को ठीक से समझ लेंगे

अब मध्यप्रदेश में 26 अक्टूबर को भी सार्वजनिक अवकाश दशहरा पर्व महोत्सव का रहेगा , मुरैना में 24 अक्टूबर को भी स्थानीय अवकाश

दशहरा पर्व महोत्सव वैसे तो 25 अक्टूबर रविवार को है और दुर्गा महानवमी 24 अक्टूबर को मनाई जानी है । मुरैना जिला प्रशासन ने जहां 24 अक्टूबर को इन महापर्वों के तारतम्य और तत्वाधान में स्थानीय अवकाश घोषित किया है तो वहीं मध्यप्रदेश शासन ने राज्य स्तर पर इन्हीं महापर्व दशहरा के तत्वाधान में राज्य शासन ने दशहरा (विजयदशमी) पर्व के लिए 26 अक्टूबर को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है। सामान्य प्रशासन विभाग ने इस संबंध में आदेश जारी कर दिए है।

मुरैना की दिमनी विधानसभा से इसलिये समर्थन नहीं किया तोमर राजवंश के फेसबुक पेज ने रवीन्द्र सिंह तोमर का

फेसबुक के तोमर राजवंश के पेज ने ग्वालियर चम्बल की विधानसभाओं के उपचुनावों के लिये कुछ प्रत्याशीयों को समर्थन दिये जाने की एक सूची अभी कुछ दिनों पहले प्रकाशित की थी , जिसमें मुरैना जिला की दिमनी विधानसभा से अनार सिंह तोमर को तोमर राजवंश के फेसबुक पेज ने अपना समर्थन दिया था ।
तोमर राजवंश की इस पोस्ट पर दिमनी के कांग्रेस प्रत्याशी रवीन्द्र सिंह तोमर के कतिपय समर्थकों द्वारा कमेंट पोस्ट किये गये । जिसके जवाब में तोमर राजवंश के फेसबुक पेज ने अपना जवाब देते हुये साफ किया है कि - इसलिये समर्थन नहीं दिया रवीन्द्र सिंह तोमर को और इसलिये समर्थन दिया अनार सिंह तोमर को , दिया गया जवाब निम्न प्रकार है -
स्थानीय और वरिष्ठ प्रभावशाली कांग्रेसी रहे हैं अनार सिंह तोमर …. रवीन्द्र सिंह तोमर को ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस में टिकिट देने के लिये एक घंटे पहले कांग्रेस में लाये थे और एक घंटे बाद ही टिकिट दे दिया था , रवीन्द्र सिंह तोमर ने मात्र चार छह लाख रूपये में कांग्रेस का टिकिट उस समय सिंधिया से खरीदा था , उस समय जिला कांग्रेस कमेटी कार्यालय मुरैना पर दिमनी विधानसभा के सभी पुराने काग्रेसियों ने प्रदर्शन किया था और सिंधिया तथा रवीन्द्र सिंह तोमर ( उ प्र निवासी ठेकेदार ) के पुतले फूंके गये , तथा देश का गद्दार , कांग्रेस का गद्दार सिंधिया …… और रवीन्द्र विदेशी वापस जाओ के नारेबाजी हुई थी , और वरिष्ठ कांग्रेसियों ने इस्तीफे दे दिये थे , जिसमें माफल का पुरा ( अम्बाह ) के वरिष्ठतम कांग्रेसी नेता केशव सिंह तोमर ने भी इस्तीफा दे दिया था कांग्रेस से ….. बाद में केशव सिंह तोमर मुरैना नगर निगम का चुनाव लड़े और पार्षद बन गये ।
रवीन्द्र सिंह तोमर बसपा का टिकट लेकर ( उ प्र के ठेकेदार थे ) उस समय उ प्र के बसपा के मंत्री बादशाह सिंह से सेटिंग और रेट पेठ रखते थे , उस जरिये बसपा का टिकिट लेकर दिमनी से बसपा के टिकिट पर चुनाव लड़े मगर तोमरघार ने उन्हें ठुकरा दिया और वे चुनाव बुरी तरह से हार गये । सब जानते हैं कि बसपा में टिकट बगैर पैसा दिये नहीं मिलता कभी ।
उसके बाद वे भाजपा में शामिल हो गये और भाजपा के टिकिट के लिये जुगाड़ लगाते रहे और पैसे की दम पर टिकिट खरीदने की कोशिशें कीं , मगर भाजपा का टिकिट नहीं मिला , उस समय हमारी बात भाजपा के वरिष्ठ नेता और केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर के बेटे से हुई और हमने पूछा कि तुम लोगों ने रवीन्द्र तोमर को टिकिट क्यों नहीं दिया , उसमें क्या कमी थी , भाजपा की ओर से साफ किया गया कि एक तो वह कहता जरूर है कि भिड़ोसा का खुद को लेकिन उसका कुछ है नहीं भिड़ौसा में , उसके दादा परदादा के जमाने से ही वह भिड़ोसा छोड़ कर यू पी में बस गये थे , पान सिंह तोमर से दुश्मनी थी इसलिये गांव छोड़ कर भाग गये थे । तब से अब तक यू पी में ही बस रहे हैं । दूसरी बात उसका चाल चलन उठक बैठक चरित्र ठीक नहीं है , भड़ियाई भी कराता है , तीसरी बात वह पैसे से टिकट लेना चाह रहा था , और पैसे को ही अपनी सबसे बड़ी पावर समझता है । इसलिये उसे उसकी पावर समझा दी है और हम लोगों ने टिकट नहीं दिया , बीजेपी के हिसाब से वह राजनीति के चौखटे में फिट नहीं बैठता , वह केवल चुनाव लड़ने के लिये नेता है , बाद बाकी जनता से या उसकी समस्याओं से उसे कुछ लेना देना नहीं है । वह केवल चुनाव के टाइम ही दो महीने का नेता बन जाता है , बाद बाकी चार साल दस महीने उसका कहीं अता पता नहीं रहता । …… ये बातें उस समय ….. हमसे उनने कहीं । उसके बाद रवीन्द्र तोमर सिंधिया के चरण शरण में तलवे चाटने पहुंच गये और चार छह लाख में कांग्रेस का टिकट ले आये और फिर तोमरघार ने उन्हें जमीन सुंघा कर धूल चटा दी , केशव सिंह तोमर पार्षद बन गये ।
अब पुराने और अपने जमीन के पैदायशी लोगों का ही सपोर्ट यहां से किया जायेगा न कि किसी ऐसे आदमी का जो इस जमीन की उपज ही नहीं है और हर बात में हर टिकट के लिये नोटों की गठरी लेकर टिकिट खरीदता घूमता है , चार साल दस महीने जिसके अते पते लापते रहते हैं और चुनाव पर दारू रोटी बांटता फिरता है ।
साफ बात है , उपरोक्त कारणों से अनार सिंह तोमर को यहां से समर्थन दिया गया है , और अनार सिंह तोमर को ही हमारा और अन्य सभी तोमरघार का समर्थन जारी रहेगा ….. अन्य किसी को नहीं ….. रवीन्द्र सिंह तोमर और ज्योतिरादित्य सिंधिया और राकेश मावई , भगवान सिंह तोमर ये सब सिंधिया के पुराने अंधे साथी और विश्वसनीय चमचे हैं , इन लोगों को हमारा और तोमरघार का समर्थन न अभी है और न कभी मिलेगा …. इन लोगों के माथे पर ही गद्दार लिखा है , अमिट है , कभी ये दाग और कलंक मिटेगा नहीं ।

बिहार: कांग्रेस ऑफिस से आईटी विभाग ने बरामद किए 8 लाख रुपए, रणदीप सुरजेवाला से पूछताछ

bb1aiomm.jpg नई दिल्ली: बिहार चुनाव प्रचार के बीच पटना में कांग्रेस के मुख्यालय के बाहर एक शख्स से पार्किंग एरिया में खड़ी एक कार से 8. 5 लाख रुपए बरामद किए गए हैं. इसके साथ ही कांग्रेस कार्यालय के बाहर से एक शख्स को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है. इसके बाद इनकम टैक्स विभाग ने कई घंटे तक कांग्रेस कार्यालय में जांच की. कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला और बिहार कांग्रेस के इंचार्ज शक्ति सिंह गोहिल से पूछताछ की गई. आईटी टीम ने कांग्रेस कार्यालय के बाहर नोटिस भी चिपकाया है.

इनकम टैक्स विभाग ने ये कार्रवाई की है. इनकम टैक्स विभाग की टीम आज कांग्रेस के ऑफिस सदाकत आश्रम पहुंची. यहाँ टीम ने जांच की और ऑफिस के पार्किंग एरिया में खड़ी कार से ये रुपए बरामद किये. इसके बाद ऑफिस के बाहर से एक शख्स को हिरासत में लिया. इनकम टैक्स विभाग काफी देर तक कांग्रेस के ऑफिस में रहा.

They served notice after money was recovered from a vehicle outside the compound. No money recovered within the compound. We’ll cooperate. 22 kg gold, 2.5 kg silver was recovered from BJP candidate from Raxaul. Why is IT not going there?: Congress’ Bihar incharge Shaktisinh Gohil https://t.co/uxJyWmi3pF pic.twitter.com/EOYYis3zy3

— ANI (@ANI) October 22, 2020
इनकम टैक्स की इस कार्रवाई को लेकर बीजेपी पर हमला बोला है. बिहार कांग्रेस इंचार्ज शक्ति सिंह गोहिल ने कहा कि कोई पैसा बरामद नहीं किया गया है. यहाँ तक कि एक बीजेपी प्रत्याशी के पास से तो 22 किलो सोना और चांदी मिली है. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट बीजेपी नेताओं पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं करता है.

नौकरी छोड़कर किया बिजनेस, आठ जिलों से ज्यादा में फैला कारोबार ( दैनिक जागरण से )

bb1aiwyw.jpg बरेली । वैभव अग्रवाल उन लोगों में से हैं जिन्होंने नौकरी छोड़कर बिजनेस किया और सफलता की कहानी लिखी। आज उनका व्यापार न सिर्फ आठ से ज्यादा जिलों में फैला है बल्कि वह एक पैरामेडिकल साइंसेज का इंस्टीट्यूट का भी संचालन कर रहे हैं। वैभव से उनकी सफलता की कहानी पूछते ही वह अतीत की यादों में खो जाते है और लंबी सांस लेते हुए कहते हैं कि मैं 2008 को एमबीए करने के बाद नौकरी करने के लिए गुड़गांव चला गया था। पहले से ही पिताजी की साबुन की फैक्ट्री थी। इसलिए थोड़ा बिजनेस का अनुभव था और मन का झुकाव भी था लेकिन एमबीए किया तो सोंचा नौकरी कर लूं
एक दिन अचानक मम्मी का फोन आया कि वैभव तुम भी चले गए। अब हम अकेले रह गए हैं। भैय्या तो पहले से ही जॉब कर रहे हैं। मैंने तुरंत ही दूसरे दिन सामान पैक किया और घर आ गया। थोड़े दिन पापा का साबुन फैक्टी में हाथ बंटाया लेकिन मैं कुछ और करना चाहता था। इसलिए मेरे दिमाग में आया कि आदमी की सबसे बड़ी जरुरत होती है रोटी कपड़ा और मकान। मैंने मकान को चुना। सोचा कि आदमी मकान बनाता है तो फिर उसे मेनटेन भी करता है और फिर मैंने गद्दे फोम से संबधित उत्पाद का थोक का व्यापार शुरु किया। देखते देखते व्यापार चल निकला।
इसके बाद फिर हमने एक इंस्टीट्यूट खोला जो कि पैरामेडिकल साइंसेज का है। वह भी मैं देखता हूं। बाद में मेरी पत्नी अदिति अग्रवाल और मैंने सोंचा कि क्यों न हम मकान की सजावट वाली चीजों की रेंज को विस्तार दें और इसका रिटेल में व्यापार करें। हमने 2018 में इंटीरियर का रिटेल में बिजनेस शुरु किया। इसके लिए हमने मॉडल टाउन चौकी के सामने शोरूम खोलने के लिए जगह खरीदी और फिर हमने बड़े स्तर पर इंटीरियर फर्नीचर का काम शुरु किया। आज हम करीब आठ से ज्यादा जिलों में व्यापार कर रहे हैं। आने वाले दिनों में हम होम फर्नीशिंग के काम पर फोकस करेंगे। इसमें हम मेट्रों शहरों में फोकस करेंगे साथ ही बरेली के लोगों को गुणवत्ता युक्त इंटीरियर का सामान उपलब्ध कराएंगे जो अभी बाहर से लोग खरीदते हैं।

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