Saturday, October 17, 2020

संस्थाओं / स्कूलों /स्वयं सेवी संस्थाओं / कपनीयों/ समितियों पंजीकृत किसी भी समिति के विरूद्ध अपराध पंजीकृत करने, विवेचना और मुकदमा चलाने की प्रक्रिया धारा 305

संस्थाओं / स्कूलों /स्वयं सेवी संस्थाओं / कपनीयों/ समितियों पंजीकृत किसी भी समिति के विरूद्ध अपराध पंजीकृत करने, विवेचना और मुकदमा चलाने की प्रक्रिया धारा 305 ( Cr.P.C. 1860 तथा 1973 ) (2010)
लेखक- नरेन्द्र सिंह तोमर एडवोकेट , म प्र
जब किसी भी पंजीकृत संस्था चाहे वह कोई कंपनी हो या समिति हो या निकाय हो या एन जी ओ हो या कोई चैरिटेबल ट्रस्ट हो या कोई स्कूल या कालेज हो या अन्य , अगर उनके खिलाफ कोई अपराध पंजीबद्ध किया जाता है , यानि उस पंजीकृत संस्था के विरूद्ध तो उसके किसी भी पदाधिकारी या अन्य को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता , यह प्रोटेक्शन सी आर पी सी की धारा 305 में पंजीकृत सभी संस्थाओं और निकायों को दिया गया है और न उन व्यक्तियों / पदाधिकारीयों के नाम से मुकदमा चलाया जा सकता है ।
इस धारा के प्रोटेक्शन के लिये संस्थाओं को एक बेहतरीन एडवोकेट से संपर्क करना चाहिये , वे ही इस धारा का मुकम्मल संरक्षण संस्थाओं को और उनके पदाधिकारीयों को दिला सकेंगें ।
सी आर पी सी की धारा में संस्था का सक्षम प्राधिकारी , पुलिस द्वारा अपराध दर्ज करने से पूर्व की जाने वाली जांच में पुलिस को एक पत्र नियुक्ति संबंधी सौंपेगा , जिसमें वह संस्था के वैध प्रतिनिधि (संस्था का लीगल एडवायजर या कोई एडवोकेट ) का नाम लिखते हुये उसे संबंधित प्रकरण मे अपना प्रतिनिधि संस्था की ओर से नियुक्त करने संबंधी पत्र पुलिस को देगा और अदालत में व पुलिस में संस्था की ओर से प्रतिनिधित्व करने का उल्लेख करेगा ।
ऐसी नियुक्ति घोषणा पर केवल हस्ताक्षर ही पर्याप्त होंगे , इस पर संस्था की कामन सील अनिवार्य नहीं होगी और जरूरी नहीं होगी ।
उल्लेखनीय है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत पंजीकृत संस्थाओं को राज्य का दर्जा प्राप्त है , जिसके अपने खुद के मेमोरेंडम व आर्टीकल आफ एसोसियेशन होते हैं जिन्हें ज्ञापन विधान कहा जाता है , उसका अपना खुद का संविधान और आंतरिक नियम व पारिनियम होते हैं, वह आंतरिक परिपत्र जारी करने हेतु प्राधिकृत होते हैं , इसलिये जिस तरह किसी राज्य या स्टेट के विरूद्ध कार्यवाही की जाती है और मुकदमे चलाये जाते है, वही प्रक्रिया पंजीकृत संस्थाओं के मामले मे अपनाई जाती है ।
सुप्रीम कोर्ट ने अनेक मामलों में अनच्छेद 12 की व्याख्या की है , और पंजीकृत संस्थाओं को राज्य का दर्जा प्राप्त उल्लेख किया है और पुलिस को ऐसी कोई कार्यवाही करने से रोक दिया है जो अनुच्छेद 12 के या धारा 305 के प्रावधानों से परे या विरूद्ध है या अतिक्रामित करती है विसंगत है , सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी सभी पुलिस कार्यवाहीयों को निरस्त कर दिया और पुलिस को दंडित किया जिनमें अनुच्छेद 12 और धारा 305 का पालन किये बगैर संस्थाओं के विरूद्ध पुलिस द्वारा कार्यवाही की गयी, ऐसी सभी कार्यवाहीयां गैर कानूनी और प्रताड़ित की जाने वाली कार्यवाहीयां मानीं गयीं ।
केवल वह संस्था ही अपने किसी पदाधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ अपराध दर्ज करा सकती है , अन्य कोई भी व्यक्ति या पुलिस सीधे किसी पदाधिकारी या कर्मचारी के विरूद्ध मामला दर्ज और अपराध पंजिबद्ध कर गिरफ्तार नहीं कर सकती । धारा 305 के प्रोटेक्शन में यह भी है कि यदि संस्था के नाम से केस दर्ज किया है तो केवल संस्था के नेम टायटल तक रहना होगा , किसी भी दोषी व्यक्ति को केवल संस्था अपनी आंतरिक जांच के आधार पर ही पुलिस या अदालत को सौंप सकती है ।
पुलिस संस्था के अभिलेख न तो जप्त कर सकती है और न देख सकती है , संस्था जितने अधिकार देना चाहेगी केवल उतनी जानकारी ही पुलिस संस्था से ले सकती है ।
संस्था जो और जितना आवश्यक समझेगी , केवल उतनी जानकारी और प्रमाणित प्रतियां जांच एजेंसी या विवेचना कर रहे पुलिस अधिकारी को देगी , वह बाध्य कर कुछ भी प्राप्त नहीं करेगी । अन्यथा यह , सी आर पी सी की धारा 305 , संविधान के अनुच्छेद 12 और सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गये आदेशों के विरूद्ध और अवमानना कारक होगा ।
नरेन्द्र सिह तोमर “आनंद” एडवोकेट

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